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सैलाब से पहले-the best inspirational story on anger in hindi language

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अंधेरे कमरे में बैठे विनय को देख कर इंदु उस के पास आती है तो वह पुरू के बारे में पूछता है और इंदु से पुरू को साथ ले कर पुलिस स्टेशन जाने को कहता है.
इंदु के जाने पर विनय अतीत की यादों में खो जाता है कि पुरू और अरविंद की शादी के दिन सभी कितने खुश थे उन की जोड़ी को देख कर. इंदु ने लाख समझाया था कि लड़के वालों के बारे में तहकीकात तो कर लो पर विनय ने किसी की एक न चलने दी थी.
शादी के 4 दिन बाद पुरू के मायके आने पर इंदु उस के चेहरे की उदासी को भांप जाती है परंतु पूछने पर वह पुरू को कुछ नहीं बताती. विनय और इंदु को पुरू के मां बनने की खुशखबरी मिलती है. एक दिन पुरू के अकेले मायके आने पर सभी अरविंद के बारे में पूछते हैं तो वह कहती है कि ससुराल वाले उसे दहेज न लाने के लिए सताते हैं इसीलिए वह ससुराल छोड़ कर आई है. उस की बातें सुन कर सभी परेशान हो जाते हैं और विनय दुविधा में पड़ जाता है
‘पापा, दीदी की हालत देखने के बाद भी आप को उन लोगों से बात करने की पड़ी है,’ वरुण उत्तेजित हो उठा, ‘अब तो उन लोगों से सीधे अदालत में ही बात होगी.’
आखिर इंदु और वरुण के आगे विनय को हथियार डाल देने पड़े. केदार भी शहर से बाहर था वरना उस से विचारविमर्श किया जा सकता था. आखिर वही हुआ जो न चाहते हुए भी करने के लिए विनय विवश थे.
पुलिस में एफ.आई.आर. दर्ज कराई गई. विनय, वरुण और इंदु के बयान… फिर पुरुष्णी के बयान के बाद तुरंत ही दीनानाथ, सुभद्रा और अरविंद सलाखों के पीछे पहुंच गए. मिलिंद अपने कालिज टूर पर बाहर गया हुआ था. घर में दूसरा कोई था ही नहीं, जो तुरंत उन लोगों के पक्ष में साथ देने अथवा सहायता के लिए खड़ा होता. रिश्तेदारी में बात फैलते देर ही कितनी लगती है. कौन दीनानाथजी के साथ खड़ा हुआ है कौन नहीं, अब विनय और इंदु को चिंता भी क्यों करनी थी?
‘इंस्पेक्टर साहब…इन की अच्छी खातिरदारी करिएगा,’ वरुण ने नथुने फुला कर जोश में कहा.
पुरू गर्भावस्था का सफर तय कर रही थी…इस अवस्था में भी पति ने…सोच कर इंस्पेक्टर ने अरविंद को खूब फटकारा था. अरविंद खामोश था… वरुण को गहरी निगाहों से ताकते हुए वह यों ही स्तब्ध खड़ा रहा.
सारे दृश्य चलचित्र की भांति दिमाग में घूम रहे थे कि इंदु की आवाज ने चौंका दिया.
सुबह 5 बजे इंदु नियमानुसार नहाधो कर स्नानघर से बाहर निकली तो विनय के कमरे से आहट पा कर वहां आ गई.
‘‘क्या…आप रातभर सोए नहीं. यों ही आरामकुरसी पर बैठेबैठे रात काट दी आप ने.’’
‘‘नहीं इंदु, कैसे सोता मैं…अपराधी को सजा मिले बिना अब सो भी नहीं सकूंगा…’’ विनय ने गहरी सांस खींचते हुए कहा, ‘‘नहाधो ली हो तो एक कप चाय बना दो. तुम से कुछ जरूरी बातें करनी हैं. और हां, पुरू और वरुण को भी जगा दो. चाहता हूं जो भी बात है एकसाथ मिलबैठ कर की जाए.’’
असमंजस के भाव क्षण भर के लिए इंदु के चेहरे पर उभरे कि ऐसी कौन सी बात होगी. फिर कुछ सोचती हुई वह रसोईघर में चली गई. कुछ ही देर बाद इंदु, पुरू और वरुण तीनों विनय के सामने बैठे हुए थे. व्यग्रता तथा चिंता के मिश्रित भाव उन के चेहरे पर आजा रहे थे…उन से अधिक उलझन विनय के चेहरे पर दिखाई दे रही थी. खुद को कुछ संयत करते हुए विनय बोले, ‘‘चाहे सौ अपराधी छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए, यह तो मानते हो न तुम लोग.’’
तीनों ही अचंभित से एकदूसरे को देखने लगे…आखिर विनय कहना क्या चाहते हैं.
‘‘बोलो, हां या नहीं?’’ विनय का कड़क स्वर पुन: उभरा.
‘‘हां,’’ तीनों ने समवेत स्वर में उत्तर दिया.
‘‘तो आज हमें पुलिस थाने में चल कर दीनानाथजी, सुभद्रा और अरविंद तीनों के खिलाफ दर्ज कराई अपनी रिपोर्ट वापस लेनी है.’’
वरुण लगभग चिल्ला कर बोला, ‘‘पापा, आप होश में तो हैं.’’
‘‘1 मिनट वरुण, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है.’’
विनय ने कठोरता से कहा तो वरुण शांत हो कर बैठ गया.
‘‘बेगुनाह होने के बावजूद 4 दिन तक जेल में बंद रह कर जो जिल्लत व अपमान उन तीनों ने सहा है उस की भरपाई तो हम चार जन्मों में भी नहीं कर पाएंगे पर हमारी वजह से उन की प्रतिष्ठा पर जो बदनुमा दाग लग चुका है उसे धुंधलाने के लिए जितने भी संभावित उपाय हैं…हमें करने ही होंगे.’’
क्षण भर की चुप्पी के बाद विनय फिर बोल उठे, ‘‘वास्तविक अपराधी को सजा अवश्य मिलनी चाहिए ऐसा मेरा मानना है. अब सजा क्या हो यह पुरुष्णी तय करेगी क्योंकि पूरा मामला उसी से जुड़ा हुआ है,’’ कहते हुए विनय ने एक गहरी दृष्टि पुरुष्णी पर डाली जो यह सब सुन कर पत्ते की तरह कांपते हुए कातर निगाहों से देख रही थी.
‘‘इंदु, यह लो और पढ़ो,’’ कहते हुए विनय ने एक परचा इंदु की ओर बढ़ाया. आश्चर्य और उत्सुकता से वरुण भी मां के नजदीक खिसक आया व इंदु के साथसाथ परचे पर लिखा हुआ ध्यान से पढ़ने लगा. पर पुरू मूर्तवत बैठी रही क्योंकि उसे जरूरत ही क्या थी वह पढ़ने की. वह परचा तो उसी का लिखा हुआ था जो उस ने अपने प्रेमी अक्षय को लिखा था पर उस तक पहुंचा नहीं पाई थी.
‘‘प्रिय अक्षय, तुम ने जीवन भर वफा निभाने का वादा मांगा है न. यों 2 हिस्सों में बंट कर जीना मेरे लिए दूभर होता जा रहा है. अरविंद से छुटकारा पाए बिना मैं पूर्णरूपेण तुम्हारी कभी नहीं हो पाऊंगी. अरविंद से तलाक पाने और तुम्हारा जीवन भर का साथ पाने का बस, यही एक रास्ता मुझे दिखाई दे रहा है. पता नहीं तुम इस बात से क्यों असहमत हो…पर अब मैं बिलकुल चुप बैठने वाली नहीं हूं. एक बार चुप्पी साध कर तुम्हें खो चुकी हूं, अब दोबारा खोना नहीं चाहती. मैं ने तय कर लिया है कि मैं अपनी योजना को निभाने…’’
आगे के अक्षर इंदु को धुंधला गए, चक्कर आने लगा. माथा पकड़ कर वह वरुण का सहारा लेने लगी… परचा हाथ से छूट कर जमीन पर जा गिरा. इंदु अचेत सी वरुण के कंधे पर लुढ़क गई.
कुछ चेतना जगी तो सामने विनय, केदार और डाक्टर खड़े थे. धीरेधीरे सबकुछ स्पष्ट होता गया. वरुण माथा सहला रहा था और पुरू अपराधबोध से गठरी सी बंधी पैरों के पास बैठी सिसक रही थी.
आराम की सलाह व कुछ दवाइयां दे कर डाक्टर चले गए. इतने लोगों के कमरे में होने पर भी एक अजीब किस्म का गहन सन्नाटा छा गया था.
‘‘केदार, अब किस मुंह से माफी मांगूं तुझ से?’’ विनय के स्वर में टूट कर बिखरने का एहसास था.
‘‘विनय, माफी तुझे नहीं, पुरू को उन सब से मांगनी होगी जिनजिन का इस ने दिल दुखाया है. अरे, शादी के 2 माह बाद ही अरविंद ने मुझे अकेले में मिलने के लिए बुलाया था. तब उस ने बताया था कि पुरू हर वक्त मोबाइल पर किसी अक्षय नाम के लड़के से बात करती रहती है. अरविंद बहुत ही समझदार और धीरगंभीर किस्म का लड़का है. मैं उसे बचपन से ही जानता हूं…यों बेवजह वह पुरू पर शक करेगा नहीं. यह भी मैं अच्छी तरह जानता था, फिर भी मैं ने उसे तसल्ली दी थी कि पुरू नए जमाने की लड़की है. कोई पुराना सहपाठी होगा… तुम्हीं उस से खुल कर बात कर लो…और बेटे, कुछ बातें पतिपत्नी के बीच रह कर ही सुलझ जाएं तो बेहतर होता है.
‘‘मेरे इस समझाने के बाद फिर कभी उस ने यह विषय नहीं उठाया. पर परसों जब मिलिंद ने मुझे जयपुर में मोबाइल पर पूरी बात बताई तो मैं सन्न रह गया. दीनानाथजी मेरे बड़े भाई समान हैं और सुभद्रा भाभी तो मेरी मां के स्थान पर हैं. तभी मैं ने तत्काल फोन पर तुम से बात की और तह तक जाने के लिए कहा था. काश, तुम्हारे इस कदम उठाने के पहले ही मैं तुम से बात कर पाता,’’ केदार अपनी लाचारी पर बेचैन हो उठे. अफसोस और अवसाद एकसाथ उन के चेहरे पर उभर आया मानो वह ही कोई दोष कर बैठे हों.
‘‘नहीं केदार, दोष तुम्हारा नहीं है, यह तहकीकात तो मुझे तुम्हारे फोन आने से पहले ही कर लेनी चाहिए थी पर पुत्री प्रेम कह लो चाहे परिस्थिति की नजाकत…न जाने मैं विवेक कैसे खो बैठा…तुम से बात न कर सका था न सही, पर एक बार दीनानाथजी से खुद मिल लेता,’’ विनय का स्वर पश्चाताप से कसक उठा, ‘‘तुम्हारे फोन आने के बाद मैं ने पुरू के सामान की छानबीन की और उसी में यह पत्र मिला जो शायद अक्षय तक पहुंच नहीं पाया था. क्यों पुरू?’’ विनय ने सख्त लहजे में कहा तो पुरू, जो इतनी देर से लगातार अपनी करतूत पर शर्म से गड़ी जा रही थी, उठ कर विनय से लिपट कर रो पड़ी.
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‘‘सौरी, पापा,’’ पुरू बोली, ‘‘मैं अक्षय से प्यार करती हूं, यह बात मैं शादी से पहले आप को बताना चाहती थी पर सिर्फ इसलिए नहीं बता पाई थी, क्योंकि उस वक्त अक्षय अचानक होस्टल छोड़ कर न जाने कहां चला गया था. मैं आप को उस से मिलवाना भी चाहती थी. मैं ने अक्षय की बहुत खोजबीन की पर कहीं कुछ पता नहीं चला और जब वह लौटा तो बहुत देर हो चुकी थी.
‘‘उस ने मुझे बताया कि उस के पिताजी की अचानक तबीयत खराब होने के कारण वह अपने शहर चला गया था पर वह अब भी मुझे प्रेम करता है इसलिए मुझ से रोज फोन पर बातें करता. मैं भी स्वयं को रोक नहीं पाती थी. अपने प्रेम का वास्ता दे कर वह मुझे मिलने के लिए बुलाता पर मैं अपनी विवशता पर रोने के सिवा कुछ न कर पाती. मैं भी हर हाल में उसे पाना चाहती थी. पर अरविंद से अलग हुए बिना यह संभव नहीं था. बस, इसलिए मैं ने…’’ कहतेकहते पुरू सिसक उठी, ‘‘मैं जानती हूं कि मैं ने जो रास्ता अपनाया वह गलत है…बहुत बड़ी गलती की है मैं ने, पर मैं अक्षय के बिना नहीं रह सकती पापा…ये सब मैं ने सिर्फ उसे पाने के लिए…’’
‘‘और जिसे पाने के लिए तुम ने अपने सासससुर को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया, अरविंद जैसे नेक इनसान के साथ विश्वासघात किया, जानती हो उस अक्षय का क्या जवाब है?’’ विनय ने पुरू पर नजरें गड़ाते हुए पूछा.
‘‘क्या…आप अक्षय से मिले थे?’’ पुरू आश्चर्य से आंखें फाड़ कर देखने लगी.
‘‘हां, तुम्हारा यह पत्र पढ़ने के बाद मैं और केदार अक्षय से मिलने गए थे. उस ने तो तुम्हें जानने से भी इनकार कर दिया. बहुत जोर डालने पर बताया कि हां, तुम उस के साथ पढ़ती थीं और उस के पीछे हाथ धो कर पड़ी हुई थीं. यकीन है मेरी बात पर या उस से मिल कर ही यकीन करोगी?’’ विनय ने गरज कर पूछा.
पुरू का तो मानो खून जम गया था कि जिस के लिए उस ने इतना बड़ा कदम उठाया वह उसे पहचानने से भी इनकार कर रहा है…विवाह के पहले अचानक होस्टल से गायब हो जाना भी कहीं उस से बचने का बहाना तो नहीं था…मन हुआ कि धरती फट जाए तो वह उसी में समा जाए. वह किसी से भी नजरें नहीं मिला पा रही थी. क्षण भर यों ही बुत बनी खड़ी रही पर अगले ही क्षण दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपा कर तेज कदमों से अपने कमरे में दौड़ गई.
वास्तविकता से रूबरू होते ही इंदु का सिर पुन: चकराने लगा. ‘अब क्या होगा मेरी पुरू का.’ ममता की मारी इंदु सबकुछ भुला कर यह सोचने लगी कि पुरू पर से अक्षय के प्रेम का भूत उतरेगा या नहीं…पुरू फिर से अरविंद के साथ जिंदगी बिताने के लिए मानेगी या नहीं…
‘‘अब बात हमारे या पुरू के मानने की नहीं है इंदु, ये हक तो हम कब का खो चुके हैं. अब बात दीनानाथजी, सुभद्रा भाभी और अरविंद के मानने की है. हमारी पुरू को माफ करें, उसे पुन: स्वीकार करें ये कहने का साहस मुझ में तो रहा नहीं और किस मुंह से कहें हम. बेटी के प्यार और विश्वास के वशीभूत हो कर जो महाभूल हम लोग कर बैठे हैं उस का प्रायश्चित्त तो हमें करना ही पड़ेगा,’’ विनय के स्वर में हताशा के साथ निश्चय भी था.
‘‘प्रायश्चित्त…यह क्या कह रहे हैं आप?’’ इंदु कांपते स्वर में बोल पड़ी.
‘‘हां, इंदु. अपनी रिपोर्ट वापस लेने के साथ ही मुझे पुरू की गलत रिपोर्ट दर्ज कराने की बात भी पुलिस को बतानी पड़ेगी. किसी सभ्यशरीफ इनसान को अपने स्वार्थ के लिए कानून का दुरुपयोग कर के फंसाना कोई छोटामोटा अपराध नहीं है. तुम्हीं ने कहा था न कि अपराधी को सजा मिलनी ही चाहिए.’’
‘‘पर विनय, पुरू के भविष्य की तो सोचो. इस समय उस के अंदर एक नन्ही जान भी पल रही है,’’ आवाज लड़खड़ा गई इंदु की.
वरुण भी लगभग रो पड़ा, ‘‘पापा…पापा, प्लीज, एक बार और सोच लीजिए.’’
‘‘नहीं वरुण, कल को यही स्थिति हमारे साथ होती तो क्या तुम अपनी पत्नी को माफ कर देते? प्रतिष्ठा कांच की तरह नाजुक होती है वरुण, एक बार चटक जाए तो क्षतिपूर्ति असंभव है. मुझे अफसोस है कि दीनानाथजी की इस क्षति का कारण हम बने हैं.’’
निरुत्तरित हो गया था वरुण. कितनी अभद्रता से पेश आया था वह अरविंद के साथ. पर अरविंद का वह मौन केवल पुरू को बदनामी से बचाने के लिए ही था.
‘‘ओह, ये हम से क्या हो गया,’’ आह सी निकली वरुण के दिल से.
सन्नाटा सा छा गया था सब के बीच. सभी भयाकुल से आने वाले दुर्दिनों के ताप का मन ही मन अनुमान लगा रहे थे.
कितना सोचसमझ कर नाम रखा था विनय ने अपनी प्यारी बेटी का…अपने गांव के किनारे से कलकल कर बहती निर्मल जलधारा वाली मनोहर नदी ‘पुरुष्णी’. पर आज यह नदी भावनाओं के आवेग से दिशाहीन हो कर बह निकली थी. अपने सैलाब के आगोश में न जाने भविष्य के गर्भ से क्याक्या तहसनहस कर ले डूबने वाली थी यह. नदी जब तक तटों के बंधन में अनुशासित रहती है, पोषक होती है, पर तटों की मर्यादाओं का उल्लंघन कर उच्छृंखल हो जाने से वह न केवल विनाशक हो जाती है बल्कि अपना अस्तित्व भी खोने लगती है. आज पुरू उर्फ पुरुष्णी ने भी अपने मायके तथा ससुराल, दोनों तटों का अतिक्रमण कर तबाही निश्चित कर डाली थी.
काश, मैं ने समय रहते ही इस पुरुष्णी पर सख्ती का ‘बांध’ बांध दिया होता…मन ही मन सोचते हुए विनय इस जलसमाधि के लिए खुद को जिम्मेदार मानने लगा.
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