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बंद घड़ी-the best inspirational story on the importance of clock

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आज बिस्तर की चादर ठीक करते हुए दीवार पर लगी घड़ी की ओर नज़र गई. ना जाने कब से, कितने महीनों से बंद पड़ी है. मैंने नज़रभर घड़ी को देखा और एक गहरी सांस ली. व़क्त जैसे ठहर गया है. व़क्त जैसे व़क्त न होकर घड़ी हो गया है, जब तक घड़ी चल रही थी, वो भी चल रहा था. घड़ी रुकी, तो वो भी ठहर गया.
और बंद घड़ी में ठहरे व़क्त की तरह ही ठहर गया है मेरा और असीम का रिश्ता. जैसे घड़ी के बारे में याद नहीं है कि वह किस दिन बंद पड़ी, ठीक उसी तरह यह भी याद नहीं कि असीम और मेरे बीच कब किस समय सब कुछ ठहर-सा गया था.
कोई हलचल, कोई उमंग, कोई लहर, कोई उत्साह नहीं. दूर क्षितिज तक जैसे एक गहरी, उदास निःश्‍वास है.
असीम का स्वभाव मुझे कभी समझ ही नहीं आया. अब तक उत्साह से भरकर, अपना समझकर उसके दिन के, मन के काम के कुछ हिस्से बांटना चाहती थी, तो वह झल्ला जाता था. उसे लगता कि मैं उसके जीवन में दख़लअंदाज़ी कर रही हूं. उसे कुरेदकर जासूसी कर रही हूं. उसकी निजता में व्यर्थ का हस्तक्षेप कर रही हूं.
मैं तो दंग रह गई थी यह प्रत्यारोप सुनकर. पत्नी के आत्मीय स्नेह की, पति के साथ, उसके जीवन के साथ, उसके कार्यकलापों के साथ जुड़ने की एक प्राकृतिक स्वाभाविकता, एक निश्‍चल प्रेम की भावना असीम को अपने जीवन में अनाधिकार हस्तक्षेप लगता है.
असीम कभी समझ ही नहीं पाया कि दांपत्य जीवन सहज प्राकृतिक रूप से बहती हुई स्वच्छ धारा की तरह होता है. उस पर यदि दुराव, छिपाव और शर्तों के बांध बना दिए जाएं, तो उसका प्रवाह रुक जाने से उसमें से दुर्गंध आने लगती है. उस पर अलगाव और बोझिलता की काई जमने लगती है.
वही काई असीम और मेरे रिश्ते पर भी जमने लगी है और उसकी दुर्गंध अब मेरी आत्मा को महसूस होती है. बड़ी घुटन-सी छाई है ज़िंदगी में.
आज मन बहुत विकल हो रहा था. देर तक मां से बात की. कुछ भी बताया नहीं, लेकिन मां मानो बच्चों का मन पढ़ लेती हैं. सब समझ गईं. बोलीं, “बेटा, किसी-किसी का मन कठोर पर्तों से घिरा होता है, देर लगती है, लेकिन कवच टूटकर देर-सबेर अंदर से कोमल मन बाहर निकल ही आता है. तुम धीरज से काम लेकर उसका मन जीतने की कोशिश करो.”
मैं चुप रह गई. कैसे समझाऊं मां को कि असीम का मन परतों से घिरा हुआ नहीं, वरन एक दुर्भेद्य किले की तरह है. और इस किले की दीवारों में सेंध लगाना या इसे जीत पाना असंभव है. बहुत वर्ष व्यर्थ कर दिए हैं अपने जीवन के मैंने इसी प्रयत्न में, मगर कुछ हासिल नहीं हुआ.
आज फिर मां का फोन आया था. समझा रही थीं कि कुछ लोगों का मन कई खानों में विभक्त होता है. उनमें से कुछ खाने खुले होते हैं और कुछ पर ताले लगे होते हैं. असीम का मन भी ऐसा ही है. खुले खानों की पहचान में ही ख़ुश रह, बंद ताले तोड़ने की कोशिश मत कर.
लेकिन क्या सच में ऐसे विभक्त होकर पूरी उम्र रहा जा सकता है?
मां-पिताजी का रिश्ता कितना सुंदर है. दोनों का मन, विचार, व्यवहार सब एक है. लगता ही नहीं कि दोनों दो अलग व्यक्ति हैं. सागर में घुली हुई नदी जैसे हैं दोनों. जिस प्रकार सागर और नदी के पानी को अलग-अलग नहीं पहचाना जा सकता, ठीक उसी प्रकार मां और पिताजी के व्यक्तित्व भी आपस में घुल-मिल गए हैं. एकमत, समन्वय, सामंजस्य की एक अनुपम सुंदर छवि है दोनों का दांपत्य.
और मीरा…असीम… प्रकृति के रचे हुए दो विपरीत ध्रुव, दिन और रात की तरह दो कभी भी एक न हो सकनेवाले. दिन और रात जो सांझ की चौखट पर खड़े होकर उदास और सरोकार रहित दृष्टि से एक-दूसरे को क्षणभर देखते हैं और फिर रात के निःस्तब्ध अंधकार में विलीन हो जाते हैं.
बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा. जीवन की धारा यदि प्रवाहमान हो, तो नित नए दृश्यों में मन रमा रहता है. सोचने और लिखने को बहुत कुछ होता है, लेकिन किसी ठहराव पर कोई कितना लिखे.
घड़ी अब भी बंद है. आज सोचा पलंग की चादर बदल दूं, पर मन ही नहीं किया. दस दिन हो गए तो क्या, एक सलवट तक तो पड़ी नहीं है. कल, परसों या फिर कभी और बदल दूंगी.
मेरे और असीम के बीच बस कामचलाऊ बातचीत ही होती है. स्नेह और आत्मीयता में बंधे वार्तालाप के धागे तो ना जाने कब के टूट गए हैं. बातें, बस यही कि आटा-दाल ख़त्म हो गए हैं या फिर आते समय फल-सब्ज़ी लेते आना.
मां-पिताजी का दांपत्य और आपसी संबंध देखते हुए बड़ी हुई थी. मन में जन्म से ही एक सहज स्वाभाविक छाप अंकित थी. विवाह यानी जीवन के हर क्षण, हर रहस्य, हर सुख-दुख और प्रत्येक पहलू को साथ जीना, यही तो होता है
जीवनसाथी. हृदय में यही कोमल, सुवासित, मगर मज़बूत, दृढ़माला लेकर मैंने असीम का वरण किया था. लेकिन कुछ ही महीनों बाद असीम के व्यवहार के कारण उस माला के एक-एक फूल मुरझाते चले गए और अब तो धागा भी टूटने वाला है…

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क्यों ऐसा है असीम? क्यूं नहीं मन मिलाकर, एक होकर अपना संपूर्ण हृदय और मन मेरे साथ मिलाकर रहता है. कैसी गांठ है उसके मन में, जो उसे अपनी ही पत्नी से पूरी आत्मीयता और सामंजस्य से रहने नहीं देती.
फिर वही सांसों का बोझ ढोते हुए दिन से रात और रात से दिन. अब तो कमरे में जाती हूं, तो बंद घड़ी से नज़रें चुरा लेती हूं. कभी लगता है वह भी बेचारी मेरी तरह ही है, ठहरी हुई, निरुद्देश्य, दीवार पर टंगी हुई है.
कभी-कभी उससे सहानुभूति होने लगती है. लेकिन उसे देखकर मेरे अपने जीवन का दुख और ठहराव और अधिक घना होकर बोझिल हो जाता है. क्या कभी ये घड़ी चलेगी और मेरा व़क्त बदलेगा…
असीम की डायरी
बहुत दिनों से देख रहा हूं मीरा अंदर से मुरझाती जा रही है. कारण भी ज्ञातव्य ही है, मेरा स्वभाव और व्यवहार. पहले पहल कितने लंबे समय तक उसने प्रयत्न किया कि वह मेरी हर सांस के बारे में जाने, मेरे व्यक्तित्व के हर पक्ष से परिचय प्राप्त करे. सही अर्थों में दो तन एक प्राण बने. लेकिन उसके साथ कुछ भी बांटना मुझे बड़ा हास्यास्पद-सा लगता था तब. बड़ी खीझ होती थी मीरा से, वह कुछ भी सोचे, कुछ भी करे, पहने-ओढ़े उससे मुझे क्या? और मैं भी क्या करता हूं, कहां आता-जाता हूं, यह उसे क्यूं बताने जाऊं. हम दोनों के ही स्वतंत्र व्यक्तित्व हैं, तो एक-दूसरे के जीवन में व्यर्थ हस्तक्षेप क्यूं करें.
मीरा मेरे स्वभाव को बहुत जल्दी ही समझ गई, तभी उसने अपना व्यवहार एकदम बदल लिया और मेरे जीवन से अपने आप को पूरी तरह काट लिया. बस, अपने कर्तव्यभर निभाती जा रही है.
लेकिन अब मेरे मन में एक खालीपन-सा होता जा रहा है. यही तो मैं चाहता था मीरा से और वो वही कर भी रही है, बिना शिकायत किए, बिना कोई जवाब-तलब किए. लेकिन अब मैं खाली-खाली-सा, आहत-सा क्यों महसूस कर रहा हूं. हर शाम को घर में पैर रखते ही मैं क्यों प्रतीक्षा करता हूं कि मीरा शुरुआती दिनोंवाले उसी प्रेम, अपनेपन और उत्साह से भरी हुई आए और अपनी सुनाते हुए कुरेद-कुरेदकर मुझसे भी मेरे बारे में पूछे.
मैं जानता हूं हम दोनों ही दो विपरीत पारिवारिक पृष्ठभूमियों से आए हैं. मीरा भरे-पूरे मज़बूत घर से आई है, इसलिए उसकी नींव भी मज़बूत है और तभी उसने मुझे भी एक पक्का, सुंदर, सुरक्षित और मज़बूत घर देना चाहा था…
उस दिन बात अधूरी रह गई थी. मगर मैं स्वेच्छा से अलग हुए महत्वाकांक्षी माता-पिता के आधे-अधूरे टूटे हुए घर से उत्पन्न हुआ था, जिसने घर के दोनों हिस्सों को बस अपना-अपना भाग समेटते देखा था. एक-दूसरे से कटे हुए अपने-अपने खोल में सिमटे हुए. मेरी प्रकृति में भी वही आधा-अधूरा, अपने आप में सिमटा हुआ बीज पड़ा था. मेरी अपनी ही नींव कमज़ोर थी, तभी तो मैं मीरा को उसका संपूर्ण घर नहीं दे सका.
अपने माता- पिता के अलगाववादी रिश्ते ने मेरे मन के चारों ओर ईंटें खड़ी कर दीं और मन में बस अपने ‘मैं’ तक ही सिमट कर रह गया.
मेरा मन एक दुर्भेद्य किला बन गया. मगर मीरा के प्यार की आंच ने जगह-जगह उन ईंटों को पिघलाकर झरोखे बना दिए थे और मन एक प्रेममय उजास से भरने लगा था कि मेरे व्यवहार ने…
मैंने स्वयं ही मीरा के मन के दीपक को बुझाकर अपना मन और जीवन अंधेरा कर दिया. प्लीज़ मीरा लौट आओ. जला लो फिर से अपने मन में मेरे लिए प्रेम का वही पवित्र दीपक, पिघला दो इस किले की सारी ईंटें, मेरे अधूरे व्यक्तित्व को अपने आप में समेटकर मुझे संपूर्ण कर दो. मुझे एक ‘पूरा घर’ दे दो मीरा, बहुत अकेला हूं मैं. मेरा हाथ थाम लो.
आज मैं तुम्हारे साथ अपना आप बांटना चाहता हूं. तुम्हारी धारा में तुम्हारे साथ घुल-मिलकर, एक होकर बहना चाहता हूं. मुझे अपनी धारा में बहा लो…
मीरा की डायरी
आज असीम के टेबल पर बिखरे काग़ज़ समेट रही थी कि एक डायरी में अपना नाम देखकर उत्सुकतावश पढ़ने बैठ गई.
पढ़ते-पढ़ते मन भर आया, आंखें नम हो गईं. मां ठीक ही कहती थीं प्रेम की ऊष्मा कठोर से कठोर ईस्पात को भी पिघला देती है. असीम के मन में भी प्रेम की ऐसी अनुभूति, ऐसी संवेदनाएं हैं, मैं उन्हें कभी समझ ही नहीं पाई. नहीं असीम, मेरे मन में तुम्हारे प्रति प्रेम का दीपक कभी बुझा ही नहीं था, वह तो सतत् जल रहा था.
अरे! यह क्या? घड़ी तो चल रही है. पता नहीं कब असीम ने नई बैटरी डालकर इसे शुरू कर दिया. कितना अच्छा लग रहा है इसे देखकर. उत्साह से, टिक-टिक करती ठुमक-ठुमककर जीवन लय के समान आगे बढ़ रही है. कितना सुखद है इसका चलना. अवरोध खुल गए हैं, अब ठहरा हुआ बासी पानी छट जाएगा और ताज़े पानी की स्वच्छ निर्मल धार कल-कल करती बहेगी.
उ़फ्! पांच बजने में स़िर्फ दस मिनट ही शेष हैं. कितना काम है, साढ़े छह बजे तक असीम का मनपसंद नाश्ता बनाना है, फिर कैंडल लाइट डिनर की तैयारी और फिर ख़ुद को भी तो संवारना है. असीम के आते ही उन्हें अपनी दिनभर की आप बीती सुनानी है और उनकी सुननी है.
और… और…
डबलबेड की पुरानी चादर हटाकर नई चादर बिछानी है. हम दोनों को मिलकर एक नया मज़बूत और ख़ुशहाल घर बनाना है.
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