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दुनियादारी-The best new motivational story with moral

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ताऊजी के लिखे इस पत्र ने अनायास ही घर में खलबली मचा दी थी. मां का रोनाधोना शुरू हो गया था, ‘‘अब जा कर उन्हें सुध आई है. जब यह 12वीं पास हुई थी तब कितना कहा था उन से कि शहर में पढ़ा दो इस को. तब तो चुप लगा गए और अब जब लड़की के ब्याह का समय आया तो कहते हैं कि इसे शहर भेज दूं नौकरी करने. कोई जरूरत नहीं है, इस के भाग्य में जो लड़का होगा, वही इसे मिलेगा.’’
पापा ने शांत स्वर में कहा, ‘‘मैं ने ही उन को लिखा था कि शेफाली के लिए कोई अच्छा लड़का हो तो बताएं. उन्होंने यही तो लिखा है कि आजकल सब नौकरीशुदा लड़की को ही तरजीह देते हैं. इसलिए इसे सुनंदा के पास भेज दो. जब तक लड़का नहीं मिलता, कहीं कोई नौकरी कर लेगी.’’
‘‘तो क्या बेटी के ब्याह का दहेज बेटी की कमाई से ही जोड़ोगे? हमें नहीं भेजना है इसे शहर. अब तक जैसे निबाहा है, आगे भी निभ जाएगी. लेकिन जवान बेटी को इतनी दूर नहीं भेजूंगी. आए दिन कैसी कैसी खबरें आती रहती हैं. दिल्ली भेजने को मन नहीं मानता.’’
‘‘अरे, अकेले थोडे़ रहेगी. सुनंदा के यहां रहेगी.’’
‘‘बेटी दामाद पर बोझ बनेगी. क्या कहेंगे दामादजी.’’
‘‘अरे, तो मैं ने थोड़ी उन से कहा था. यह भाई साहब का सुझाव है. कोई अच्छा लड़का मिल जाएगा तो इस के हाथ पीले कर देंगे. नहीं जंचा तो हाथ जोड़ कर माफी मांग लेंगे. अब इस मामले में ज्यादा बहस मत करो.’’
दूसरी तरफ उस पत्र ने शेफाली के युवा मन को स्वप्निल पंख दे दिए थे. उस ने भी मां को मनाना शुरू कर दिया, ‘‘मां, मुझे एक बार जाने दो न. कौन सा मैं नौकरी करने की सोच रही थी. लेकिन अगर मौका मिल रहा है तो हर्ज क्या है? अगर काम जंच गया तो तुम आ कर मेरे साथ रहना. हम अलग घर ले लेंगे. सोचो न मां, आगे छोटू बंटू के लिए भी नए रास्ते खुल जाएंगे.’’
रोतीबिसूरती मां मान गईं. शेफाली के जाने की तैयारी शुरू हो गई. आंसू भरी आंखों से विदाई देते हुए मां ने सावधानी से रहने की ढेरों हिदायतें दे डाली थीं.
ट्रेन की खिड़की से ‘नई दिल्ली रेलवे स्टेशन’ का बोर्ड पढ़ते ही शेफाली के दिल की धड़कनें एक नई ताल में धड़क उठी थीं. उसे लेने सुनंदा दीदी के पति संदीप जीजाजी स्टेशन आए थे. बड़ा ही आकर्षक व्यक्तित्व था उन का. उस ने बढ़ कर पैर छूने चाहे तो उन्होंने बीच में ही रोक दिया. वह भी झिझक उठी. जब दीदी का विवाह हुआ था तब वह 8वीं में पढ़ती थी. लेकिन अब ग्रेजुएट हो गई थी.
स्टेशन से दीदी के घर तक का उस का सफर कितना रोमांचक और उत्सुकता से भरा था. वह अपने जीवन के इन सुखद क्षणों को सराहे बिना नहीं रह सकी, जिस ने उसे इतनी बड़ी कार में बैठने का मौका दिया था, अचानक एहसास हुआ कि इसी दुनिया में लोग इस तरह भी शान से जीते हैं.
खिड़की से बाहर झांकती शेफाली अपने देश की राजधानी के एकएक कोने के परिचय को आत्मसात करती जा रही थी. चौड़ी सड़कें, बडे़छोटे हर आकार के घर. बच्चों के खेलने के लिए जहां तहां बने पार्क. बढि़या होटल, सजीधजी दुकानें देख उस का मनमयूर नाच उठा. वह सोचने लगी कि यहां लड़कियां कितनी आजाद हैं. आराम से जींसपैंट, स्कर्ट और झलकता हुआ टौप पहन कर घूमती हैं. अपनेआप आटो रोक कर चढ़ जाती हैं. सब अपने में निश्ंिचत, बेधड़क घूम रही हैं. उसे आजादी का यह माहौल देख कर बहुत अच्छा लगा.
उस की सोच को विराम तब लगा जब जीजाजी ने जोर से हौर्न बजाया. गाड़ी एक बडे़ से फाटक के सामने रुकी थी. वरदी पहने एक चुस्त आदमी ने आ कर गेट खोला. पार्किंग में एकसाथ कई तरह की गाडि़यां खड़ी थीं. रंगबिरंगे कपड़ों में सजेसंवरे, दौड़ते बच्चों को खेलते देख कर उस ने अंदाजा लगाया कि यहां सब अमीर लोग रहते हैं.
जीजाजी का घर छठी मंजिल पर था. लिफ्ट से निकलते हुए पापा हड़बड़ा गए, ‘कहीं फंस गए तो इसी में रह जाएंगे,’ कह कर उन्होंने अपनी झेंप मिटाई थी. आमनेसामने कुल मिला कर 4 मकान थे. जीजाजी ने आगे बढ़ कर घंटी दबाई. घंटी दबाते ही एक मीठी फिल्मी धुन हवा में तैर गई.
हर घर के बाहर की सजावट वहां रहने वालों के कलात्मक शौक को दर्शा रही थी. दीदी के यहां दरवाजे के दोनों तरफ मिट्टी के बडे़बडे़ छेद वाले घडे़ रखे थे. मोटा मखमली पायदान, कतारों में लगे पौधे.
अंदर से किसी के आने की आहट हुई तो वह सहज हो गई. थोड़ी देर में दरवाजा खुला और एक अजनबी चेहरा नजर आया.
‘‘निर्मला, सामान उठाना,’’ कह कर जीजाजी भीतर चले गए थे.
‘‘मेमसाब बाथरूम में हैं,’’ कह कर निर्मला भी परदे के पीछे चली गई.
दोनों बाप बेटी, सामने बिछे कालीन को पार कर, सोफे में धंस गए. घर किसी फिल्मी सेट की तरह सजा हुआ था. हर चीज इतनी कीमती कि दोनों कीमत का अंदाजा भी नहीं लगा सकते थे. बड़ा सा टीवी, लेदर का सोफा, शीशे की गोल सेंटर टेबल, बढि़या कालीन, चमकदार भारी परदे. सजावट की अलमारी में रखी महंगीमहंगी चीजें, सुंदर सुंदर बरतन, अनेक प्रकार के कप और ग्लास, रंगबिरंगी मूर्तियां और सुनहरे फ्रेम में जड़ी बड़ीबड़ी पेंटिंग.
अपने 2 कमरे वाले सरकारी घर को याद कर शेफाली सकुचा उठी थी. आंखों के सामने अपने घर की बेतरतीबी पसर गई. यहां आने से पहले वही घर शेफाली को कितना अच्छा लगता था. गृहप्रवेश वाले दिन सब की बधाइयां लेते हुए मां का कलेजा गर्व से कितना चौड़ा हो गया था. लेकिन कितना फर्क था इन 2 घरों की हैसियत में. ताऊजी के शहर आने से उन के परिवार के सदस्यों के रहनसहन के स्तर में कितना परिवर्तन आ गया था.
पल भर में ही निर्मला ट्रे में शीशे के चमचमाते गिलास में ठंडा पानी डाल कर ले आई. उस के बाद चाय और मिठाईनमकीन से सजी प्लेट रख गई. वह अपने काम में कुशल थी. अभी तक दीदी नहीं आईं. वक्त जैसे उन के इंतजार में रुक गया था. कितनी देर हो गई. वह तो जानती थीं कि आज हम आ रहे हैं फिर भी…जीजाजी भी अंदर जा कर गायब हो गए. ये भी कोई बात है. उस ने उकता कर पापा की तरफ देखा.
भतीजी के घर की शानोशौकत ने उन की आंखें फैला दी थीं. उन के चेहरे की खुशी और उत्कंठा के भाव बता रहे थे कि वह मां को सब बताने के लिए बेचैन हो रहे थे.
सच है, जिस लक्ष्मी को शेफाली के पापा ने सदा ज्ञान के आगे तुच्छ समझा था वही आज अपने भव्य रूप में उन्हें लुभा रही थी. सदा के संतोषी सुखी, पिता पुत्री अपनी गरीबी को सोच कर आपस में ही संकुचित हो रहे थे.
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‘‘अरे, चाय ठंडी हो रही है, लीजिए न चाचाजी.’’
मुसकुराती हुई, खुशबू बिखेरती हुई सुनंदा दीदी की मीठी आवाज गूंजी. कितनी गोरी, कितनी सुंदर, कितनी स्मार्ट लग रही थीं. उन्होंने आगे बढ़ कर पापा के पैर छुए.
पापा ने गद्गद कंठ से आशीर्वाद दिया.
शेफाली जैसे ही दीदी के पैर छूने को झुकी, उन्होंने उसे गले लगा लिया. उस के मन की सारी आशंकाएं खत्म हो गईं. वह सोच रही थी कि पहले से ही दर्पभरी दीदी इस वैभवऐश्वर्य को पा कर और घमंडी हो गई होंगी, लेकिन वह बदल गई हैं…यह भी नहीं सोचा कि रास्ते की गर्दधूल से सनी है मेरी देह. चाय पीते हुए दीदी ने सब का हाल पूछा. फिर उस का कमरा दिखाया.
‘‘बेटा, इतने प्यार से सुनंदा तुम को रख रही है, तुम भी उसे पूरा मानसम्मान देना. अच्छे से रहना. तुम्हारी मां सुनेगी तो खुश हो जाएगी. मुझे भी तसल्ली हुई कि तुम्हें यहां कोई कष्ट नहीं होगा.’’
भीतर से जीजाजी तैयार हो कर निकले. उन्हें आफिस जाना था. वह नाश्ता कर के विदा ले कर चले गए.
‘‘आप लोग भी नहाधो लीजिए और नाश्ता कर के आराम कीजिए,’’ कह कर दीदी फोन पर व्यस्त हो गईं.
खाना खा कर पापा जा कर लेट गए. उन्हें शाम की गाड़ी से लौटना था. उसे भी आराम करने को कह कर दीदी अपने कमरे में चली गईं.
शाम को दीदी ने पापा से कहा, ‘‘चाचाजी, मैं कुछ कपडे़ लाई थी, छोटूबंटू के लिए और चाचीजी के लिए साडि़यां. इन्हें रख लीजिए. मैं थोड़ा बाजार से आती हूं, फिर आप को स्टेशन छोड़ कर आफिस निकल जाऊंगी.’’
‘‘अभी शाम को आफिस, बिटिया,’’ पापा कहते हुए हिचके.
‘‘हां, चाचाजी, मैं एक काल सेंटर में नौकरी करती हूं. मेरे सारे क्लाइंट्स अमेरिकन हैं. अब भारत और अमेरिका में तो दिनरात का अंतर होता ही है. इसीलिए रात को नौकरी करनी पड़ती है. वैसे शिफ्ट बदलती रहती हैं. कंपनी सारी सुविधाएं देती है. आनेजाने के लिए कार पिकअप, खानापीना सब. सुबह 12 बजे मैं घर आ जाती हूं,’’ दीदी ने सहज हो कर जवाब दिया.
‘‘और दामादजी?’’
‘‘वह कंप्यूटर की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सिस्टम एनालिस्ट हैं. उन की ड्यूटी सुबह 10 से शाम 7 बजे तक होती है. वह 8 बजे शाम तक आएंगे. आप से भेंट नहीं हो पाएगी.’’
‘‘दीदी, आप अमेरिकियों से किस भाषा में बात करती हैं?’’ शेफाली ने जिज्ञासा जाहिर की.
‘‘अमेरिकन इंग्लिश में, जिस की कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी जाती है,’’ दीदी ने मुसकरा कर कहा, ‘‘तुम भी सब सीख जाओगी. निर्मला, खाना जल्दी बना लेना. चाचाजी को जाना है.’’
‘‘घर की सारी व्यवस्था नौकरानी के हाथों में है. ऐसी नौकरी का क्या फायदा,’’ पापा बोले, ‘‘शेफाली, तुम ऐसी नौकरी मत करना, चाहे कितना भी पैसा मिले. हम लोग तो शहर के रहने वाले नहीं हैं. तुम्हारा ब्याहशादी सब बाकी है अभी, समझी न.’’
शेफाली ने हामी भरी, ‘‘आप बेफिक्र रहें, पापा.’’
पापा के जाने के बाद शेफाली ने निर्मला से पूछा, ‘‘मिंटी नजर नहीं आ रही है.’’
‘‘आज देर से आई है और तब आप सो रही थीं. अभी वह सो रही है.’’
निर्मला ने खाना बना कर टेबल पर रखा, फटाफट रसोई साफ की और बोली, ‘‘साहब आएंगे तो आप लोग खा लेना.’’
जीजाजी आते ही अपने कमरे में चले गए. वहां से टीवी चलने की आवाज आती रही. उस से उन्होंने बात भी नहीं की. वह अपनेआप को उपेक्षित महसूस करने लगी. रात को बिना खाए ही सो गई.
सुबह निर्मला के आने पर शेफाली की नींद टूटी. उस ने आते ही मिंटी का नाश्ता बनाया. फिर उसे उठाया, तैयार किया और 8 बजे स्कूल बस में चढ़ा आई. फिर जीजाजी के नाश्ते की तैयारी में लग गई. 10 बजे तक जीजाजी भी चले गए.
बेहद जल्दीजल्दी निर्मला काम निबटा रही थी. झाड़ ूपोंछा, बिस्तर झाड़ना, सोफे, परदे, खिड़की, दरवाजे, शोकेस सब की डस्ंिटग की. फिर फटाफट खाना बनाया. मशीन में कपड़े डाले. 12 बजे तक उस ने तमाम काम निबटा लिए, नहाधोकर शैंपू किए हुए बालों को फहराते हुए वह कपडे़ सुखाने लगी.
एकदम घड़ी की सुईयों से बंधा था निर्मला का एकएक काम. इतने काम में तो मां का सारा दिन निकल जाता है और फिर भी वह अस्तव्यस्त सी घूमती रहती हैं. मां ही क्या ज्यादातर औरतों का यही हाल है.
निर्मला का पति एक पब्लिक स्कूल में चौकीदार है. 7 साल की एक बेटी भी है, जो उसी स्कूल में पढ़ती है. घर में कूलर है, रंगीन टीवी है, टेप है. ये दीदी का घर संभालती है और इस का घर इस की सास संभालती है. आखिर निर्मला भी काम- काजी बहू है.
दरवाजे की घंटी ने मधुर स्वर छेड़ा, दीदी आ गईं. नींद से उन की आंखें लाल थीं. उन्होंने किसी तरह चाय के साथ एक टोस्ट निगला. ठंडे स्वर में उस का हाल पूछा और निर्मला को डिस्टर्ब न करने का निर्देश दे कर बेडरूम में चली गईं.
थोड़ी ही देर में मिंटी आ गई. जैसे तैसे निर्मला ने उस के कपडे़ बदले, खाना खिलाया, फिर मिंटी टीवी पर कार्टून देखने बैठ गई. निर्मला बीचबीच में उसे आवाज कम करने को कहती रहती. 4 बजे निर्मला उठी, चाय बनाई, खुद पी, शेफाली को दी, फिर मिंटी को घुमाने पार्क में ले गई. वहां से आ कर दूध पिलाया, खाना खिलाया और 6 बजे उसे सुला दिया.
शेफाली ने निर्मला से पूछा, ‘‘दीदी कब उठेंगी?’’
‘‘नींद टूटेगी तो उठ जाएंगी. इसीलिए बेबी को सुला दिया है, नहीं तो तंग करती है और मेमसाब गुस्सा हो जाती हैं.’’
वह यह देख कर हैरान रह गई कि 4 साल की बच्ची पूरी तरह आया के भरोसे परवरिश पा रही थी. मां बेखबर सो रही थी. पापा का फोन आया, बातें कीं, फिर वह बोर होने लगी. एक ही दिन में नीरसता सताने लगी. आ कर अपने कमरे में लेट गई. कैसी शांति है यहां, 4 कमरे, 4 आदमी. न कोई बातचीत, न ठहाके. उसे अपने घर की याद आ गई और रुलाई फूट पड़ी. जाने कब आंख लग गई.
घंटी बजी तो वह जागी. जीजाजी आए थे. वह बाथरूम से हाथमुंह धो कर बाहर निकली और ठिठक कर वापस अपने कमरे में चली गई. दीदीजीजाजी ड्राइंगरूम में ही टीवी के सामने एकदूसरे से लिपटे, एकदूसरे के होंठों को बेतहाशा चूम रहे थे, जैसे फिल्मों में देखती है. जीजाजी के हाथ दीदी के उभारों पर… शेफाली की कनपटी गरम हो गई.
दीदी ने थोड़ी देर बाद निर्मला को आवाज दे कर चाय लाने को कहा. वह शर्म से पानीपानी हो गई. निर्मला सब जानतीदेखती होगी. वह थरथरा गई.
दीदी ने उस के बारे में पूछा, निर्मला बोली, ‘‘सो रही हैं.’’
शेफाली ने सुकून महसूस किया कि चलो, सामने नहीं जाना पड़ेगा. निर्मला चली गई. थोड़ी देर बाद दीदी भी. जीजाजी दरवाजे तक छोड़ने गए थे. उस ने परदे के पीछे से साफ उन का आलिंगन और चूमना देखा. अब रह गए जीजाजी और शेफाली. डर और संकोच से सराबोर वह सामने पड़ने से कतराती रही.
वह और जीजाजी रात को अकेले…आगे शेफाली सोच नहीं पाई. अब यहां रहना है तो निर्मला की तरह अनजान बन कर रहना होगा. इन के घर की निजता का खयाल रखना होगा.
कुछ ही दिनों में शेफाली यहां के माहौल में रम गई. अब स्कूल से आते ही मिंटी मौसीमौसी करने लगती. कहानियां सुनतेसुनते वह कब खा लेती पता ही नहीं चलता. दीदीजीजाजी भी निश्ंिचत हो कर मिंटी की प्यारी गप्पें सुनते. अब उसे सुलाने की जल्दी किसी को नहीं रहती. शेफाली के पास छोड़ दोनों एकांत में वक्त बिताते. निर्मला भी निश्ंिचत हो काम निबटाती. घर के औपचारिक माहौल में एक स्वाभाविकता आ गई थी.
एक दिन दीदी ने सलाह दी, ‘‘शेफाली, तुम संदीप से कंप्यूटर सीख लो.’’ तो उस ने हिचक के साथ इस प्रस्ताव को स्वीकारा था. दीदी और निर्मला के जाने के बाद जब मिंटी सो जाती तो दोनों बैठ कर कंप्यूटर पर नया साफ्टवेयर सीखते. जीजाजी के बदन से उठती परफ्यूम की खुशबू उस को उस दृश्य की याद दिला देती थी.
कंप्यूटर के नामी इंस्टीट्यूट जो कोर्स 6 महीने में सिखाते हैं वह जीजाजी से कुछ ही दिनों में शेफाली सीख गई. कंप्यूटर टाइपिंग, ई-मेल करना, इंटरनेट पर काम करना, सर्च करना आदि.
फोन पर ये सब सुन कर मां भावुक हो उठीं, ‘‘तुम्हारे पापा कह रहे थे कि क्या हुआ जो उसे सुनंदा की तरह कानवेंट में नहीं पढ़ा पाए. समझदारी और दुनियादारी तो कोई भी शिक्षा सिखा देती है. शेफाली अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी तो भैया जैसा अच्छा दामाद हमें भी मिल जाएगा. दामादजी को भी तुम्हारा व्यवहार अच्छा लगा तो वह भी बढ़ कर मदद कर देंगे?’’
जल्द ही शेफाली की मर्केंडाइजर की नौकरी लग गई. अब वह भी व्यस्त हो गई. अकसर जीजाजी उसे साथ ले आते.
फ्रेश हो कर वह अपने और जीजाजी के लिए कौफी बनाती. दिन भर के काम के बाद घर आ कर जीजाजी का साथ उसे भाने लगा था. दोनों साथ टीवी देखते. अब अटपटे दृश्यों पर चैनल नहीं बदले जाते थे. न ही कोई उस समय उठ कर जाता. सब कितना सामान्य लगने लगा था. शेफाली इसे मैच्योर होना कहती. फिर जहां ऐसा खुलापन चलता है तो क्या हर्ज है. दीदी तो उस के सामने सिगरेट भी पीने लगी थीं.
उस ने दीदी को कुछ दिन पहले एक लेख पढ़ने को दिया था, ‘धूम्रपान का गर्भ पर असर.’ दीदी हंस दी थीं, ‘‘अब कौन सा बच्चा पैदा करना है मुझे, एक हो गया न, और कौन सा मैं मिंटी के सामने पीती हूं्. देख न, इसीलिए रात की नौकरी करती हूं. रात में तो सब सोते ही हैं. घर में रहो न रहो, क्या फर्क पड़ता है. दिन में मैं घर में ही रहती हूं ताकि मिंटी मां को मिस न करे.’’
साहस कर शेफाली बोल पड़ी, ‘‘लेकिन दीदी, जीजाजी…’’
दीदी हंसीं, ‘‘देख, मर्दों को दिन में एक बार या हफ्ते में औसतन 2-3 बार काफी होता है. मैं अपने पति को पूरा मजा देती हूं. संदीप ने कुछ कहा क्या? क्यों नहीं साली आधी घरवाली होती है.’’
यह कह कर दीदी ने आंख दबाई तो वह तिलमिला गई थी. छोटी बहन से इतना गंदा मजाक, ‘‘छी: दीदी, आप कैसी भाषा का इस्तेमाल करती हैं. जीजाजी बहुत अच्छे हैं. आप इस तरह बोलेंगी तो फिर मैं यहां नहीं रहूंगी…’’
वह खिलखिला पड़ीं, ‘‘यू विलेज गर्ल…जानती है, हमारे यहां क्या होता है…’’
और उन्होंने अपने आफिस के माहौल और वहां इस्तेमाल होने वाली भाषा का जो वर्णन किया, उसे वह सुन नहीं पाई.
‘‘दीदी, आप छोड़ दो ऐसी नौकरी.’’
वह हंसीं, ‘‘लाइफ इज मस्त आउट देअर. आजकल सब चलता है. आज का फंडा है, जिंदगी एक बार ही मिलती है, इसे भरपूर जीओ और ज्यादा अगरमगर की मत सोचो.’’
तभी जीजाजी आए. अब दोनों उस के सामने ही ‘किस’ कर लेते. दीदी हंसहंस कर बोलीं, ‘‘शेफाली को तुम्हारी बहुत चिंता है. कह रही थी कि मैं रात की नौकरी छोड़ दूं. तुम अकेले हो जाते हो, क्यों?’’
शेफाली उठ कर भीतर चली गई. छी:, जरा भी लाजलिहाज नहीं है दीदी में. यह बात उन्हें कहनी चाहिए थी. या तो उन दोनों का आपस में बहुत विश्वास और खुलापन था या फिर दीदी की नजर में मेरी कोई अहमियत ही नहीं. जीजाजी की नजरें कितनी अजीब हो गई थीं.
उस रात मिंटी को बुखार आ गया लेकिन क्लाइंटविजिट की वजह से दीदी को जाना पड़ा. मिंटी के सोने के बाद जैसे ही वह उठी, जीजाजी बोले, ‘‘शेफाली, कौफी बनाओगी.’’
वह काफी बना लाई. जीजाजी एकाएक बोले, ‘‘तुम्हारे आने के बाद घर घर लगने लगा है. तुम्हारे आने से मिंटी को मां मिल गई. अब काम खत्म कर के मन करता है, सीधा तुम्हारे पास आऊं. काश, सुनंदा में भी तुम्हारे जैसी संवेदनशीलता होती, तो मेरी जिंदगी यों तन्हा नहीं होती. देखा, तुम तो समझ गईं वह जान कर भी नहीं समझना चाहती मेरा अकेलापन, मेरी तनहाई. दिन भर का थकाहारा घर आता हूं तो न पत्नी मिलती है और न बच्ची का साथ. तुम ने आ कर मेरी जिंदगी के बिखराव को संभाल लिया.’’
‘‘आप दीदी से कहिए न कि वह दूसरी नौकरी ढूंढ़ लें.’’
‘‘अब सिंपल ग्रेजुएट और 12वीं पास लोगों को इतने पैसे वाली नौकरी कौन देता है. बड़ीबड़ी डिगरी वाले तो मार्केट में घूमते हैं. यहां क्या योग्यता चाहिए, बस अच्छी अंगरेजी का ज्ञान और प्रकृति के नियमों के खिलाफ जीने की आदत. और बदले में मिलता है पैसा, कमीशन, पार्टियां, पिज्जाबर्गर और कोल्डड्रिंक्स. उसे जिंदगी की रंगीनियां चाहिए. और मैं ठहरा पार्टीपिकनिक से परहेज करने वाला.’’
शेफाली खामोश उन्हें निहार रही थी. मन मचलने लगा था. कैसी संवेदनशील थीं वे आंखें. अंदर तक कुछ शून्य सा पसर गया था. क्या वह मेरी तरफ आकर्षित हैं. मैं उन्हें अच्छी लगती हूं. वह मुझ से प्रेम करते हैं. रोमरोम में उठती ये कैसी सिहरन थी. आंखें मूंदे शेफाली अपनी देह की कंपन पर काबू पाने की चेष्टा करने लगी. जीजाजी ने उस के हाथों पर अपना हाथ धर दिया.
कप उठा कर वह किचन में चली गई. ये क्या हो रहा है उसे. जो बात कुंआरी हो कर वह समझ पाई क्या दीदी नहीं समझ पाती होंगी? दीदी ने तो कहा था कि वह हफ्ते के एवरेज का खयाल रखती हैं…तो…फिर…जीजाजी को मुझ से यह सब कहने की क्या जरूरत है…वह मेरी प्रशंसा कर क्या चाहते हैं…मुझ से यह सब क्यों कह रहे हैं…मुझे पाने के लिए…इतनी शिकायत है दीदी से तो फिर प्रेम प्रदर्शन क्यों करते हैं. दीदी का विरोध क्यों नहीं करते?
दीदी के व्यवहार में तो उस ने कभी जीजाजी के प्रति उपेक्षा महसूस नहीं की. अंदर दोनों में क्या बातें होती हैं वह नहीं जानती पर उस दिन जो ड्राइंगरूम में उस ने देखा था वह तो झूठ नहीं था. बिना चाहत, बिना प्रेम भी ऐसी उत्तेजना जगती है भला.
थोड़ी आहट के बाद किचन की बत्ती बंद हो गई. जीजाजी ने आ कर उसे बांहों में भर लिया. ये खुशबू, ये आलिंगन, ये स्पर्श, संदीप उसे पागलों की तरह चूमने लगे. उस का रोमरोम सिहर उठा. वह खुद को छुड़ाना नहीं चाहती थी. उस के बदन में चींटियां रेंगने लगीं. कितना अच्छा लग रहा है…
तभी फोन की घंटी बजी. दीदी का फोन था. मिंटी का हाल पूछ रही थीं. वह जैसे सोते से जागी. ये क्या करने जा रही थी वह? अपने ही हाथों अपना सर्वनाश. इस क्षणिक भावुकता का अंत क्या होने वाला था. उस के हाथ क्या लगता? कल को कुछ हो गया तो आरोप तो उस के ही सर आएगा. बढ़ावा भी तो उसी ने दिया था. वही दीदी से बात करने गई थी, उन के दांपत्य जीवन पर.
दीदी के सामने शराफत का ढोंग करने वाले जीजाजी तो अपना मुंह तक नहीं खोलेंगे. उस की बात उसी के खिलाफ इस्तेमाल की जाएगी. क्या वह जानती थी कि ये फांस उसी के गले में अटकेगी. कितने चालाक निकले जीजाजी. मेरी कोमल भावनाओं को उकसा कर, मात्र मेरा उपयोग करना चाहते थे. आज अपने ही घर में अपनों के हाथ छली जाती. ऐसे ही अनचाहे तो हादसे हो जाते हैं.
अपनी उखड़ी सांसों को संयत करते हुए वह मिंटी के पास आ गई. दीदी को मिंटी की चिंता है और वह कैसे उन पर लापरवाही का आरोप लगा रहे थे.
फोन रखने के बाद जीजाजी ने उसे कमरे में आने का इशारा किया. उसे खुद से घृणा होने लगी. शेफाली ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया और मिंटी के पास ही सो गई. सुबह निर्मला के आने पर ही दरवाजा खोला.
मिंटी का बुखार और बढ़ गया था. दीदी ने आफिस से हफ्ते भर की छुट्टी ले ली. दिनरात बच्ची के पास ही बैठी रहतीं. अपने हाथों से उसे खिलातीं. उस के साथ बातें करतीं. उस के सामने दीदी का नया रूप उजागर हुआ था. सच कहते हैं, मां आखिर मां ही होती है और पुरुष, सिर्फ पुरुष.
शेफाली ने आननफानन में फैसला लिया और आफिस के एक सहयोगी की मदद से अलग घर ढूंढ़ लिया. सुनंदा दीदी हैरान रह गईं, ‘‘अचानक क्या हो गया, शेफाली? तुम्हारे आने से हम लोगों को कितना अच्छा लगने लगा है, मिंटी कितनी खुश रहने लगी है. मेरी लाइफ भी स्मूथ हो गई है. अब चाचाचाची क्या कहेंगे?’’
शेफाली ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘दीदी, आफिस दूर पड़ता है. फिर कितने दिन आप पर बोझ रहूंगी. इतने महीनों से तो आप ही के पास रह रही हूं. अब तो नौकरी भी कर रही हूं…’’
‘‘आई नो…पर तुम्हारी शादी तक चाचाजी ने कहा था, तुम यहीं रहोगी.’’
‘‘दीदी, शादी कब होगी, पता नहीं. कोई अच्छा लड़का मिलेगा तो जरूर करूंगी. पर अब कुछ साल नौकरी कर लूं. आप की तरह आत्मनिर्भर बन जिंदगी का मजा ले लूं. इस दिशा में कुछ होगा तो कहना. मैं आती रहूंगी…संपर्क में रहूंगी.’’
उस के होंठों पर मुसकराहट थी पर स्वर काफी सपाट था.
दीदी ने उलझे स्वर में ही जवाब दिया, ‘‘अब तुम ने सोच ही लिया है तो मैं क्या कहूं. पर मुझे अचानक इस फैसले का कारण समझ में नहीं आया. जीजाजी भी यहां नहीं हैं. उन से आ कर मिल लेना या फिर फोन कर देना.’’
दीदी कभी जानें या न जानें पर उस रात कहां ले जातीं उस की ये भावनाएं… निश्चित ही पतन की ओर…मांबाप का गर्व भंग होता, भाई का उपहास, समाज में अनादर…सब से उबर गई. अपनों के बीच हुए किसी हादसे का शिकार होने से बच गई.
मां की कही बात याद आ गई, ‘‘समझदारी और दुनियादारी तो कोई भी शिक्षा सिखा देती है.’’
मैं आशा करता हूँ की आपको ये story आपको अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्। ऐसी ही और कहानियों के लिए देसिकहानियाँ वेबसाइट पर घंटी का चिन्ह दबा कर सब्सक्राइब करें।

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