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सबसे बड़ा पुण्य-The biggest virtue a simple and short inspirational Story

जिंदगी

बचपन में जहाँ चाहा ,हंस लेते थे , जहाँ चाहा रो लेते थे , पर अब मुस्कान को तमीज चाहिए और आंसुओं को तन्हाई – हम भी मुस्कराते थे कभी बेपरवाह अंदाज़ में ,देखा है आज खुद को कुछ पुरानी तस्वीरों में -चलो मुस्कराने की वजह ढूंढते है -जिंदगी तुम हमें ढूंढो – हम तुम्हे ढूंढते हैं।
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कहानी -सबसे बड़ा पुण्य – एक राजा था जो बड़ा ही प्रजापालक था। वह हमेशा अपने सुख का ख्याल ना रखकर जन कल्याण के बारे में ही सोचता रहता था। यहां तक कि मोक्ष का साधन यानी भगवत -भजन भी नहीं कर पाटा था। एक दिन उन्हें देव के दर्शन हुए और उनके हाथों में एक लम्बी -चौड़ी पुस्तक देखकर पूछा l महाराज ,आपके हाथों में क्या है ? डॉ बोले -राजन ,यह हमारी बही -खाता है जिसमे सभी भजन करनेवाले के नाम हैं। राजा ने कहा ,-कृपया देखिये ,इसमें मेरा नाम है कि नहीं। देव महाराज को राजा का नाम पुस्तक में नहीं मिला। राजा ने कहा – महाराज आप चिंतित ना हो। वास्तव में मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन – कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता .शायद इसलिए मेरा नाम नहीं है। राजा पुनः परोपकार कार्य में लग गए। कुछ दिनों बाद उन्हें फिर वही डॉ के दर्शन हुए। उनके हाथ में एक पुस्तक थी पर उसका आकार बहुत छोटा था। राजा ने पूछा -महाराज ,आज आपने कौन सा बही खाता लिया हुआ है ? राजन ,आज के बही -खाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर के सबसे अधिक प्रिय हैं . राजा ने कहा -कितने भाग्यशाली लोग होंगे वे लोग जो दिन -रात भगवत -भजन में लीन रहते होंगे। क्या इस पुस्तक में मेरे राज्य के भी कोई नागरिक हैं ? देव महाराज ने बही खाता खोला पहले ही पैन पर राजा का नाम था। राजा ने कहा मेरा नाम कैसे लिखा है ?
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मै तो मंदिर कभी -कभार ही जाता हूँ। डॉ ने कहा -राजन ,इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं और लोगों के उपकार में अपना जीवन अर्पण कर देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है। लोगों की सेवा कर तुम भगवान् की ही पूजा करता है। परोपकार और निःस्वार्थ सेवा किसी भी उपासना से बढ़कर है। कर्म करते हुए सौ बर्ष जीने की इच्छा करो तो कर्म बंध में लिप्त हो जाओगे। ईश्वर को खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है। जो परोपकार करते हैं वही भगवान् के सबसे बड़े प्रिय होते हैं। कहा भी गया है -परोपकाराय पुण्याय भवति जीवन की सार्थकता भी इसी में निहित है।

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