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ठग का ग्रास-Try of swindler a new short hindi language for motivation

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मक्का शरीफ की तीर्थ यात्रा के लिए जब दो शहरी चलने लगे तब एक देहाती भी उनके साथ चलने को तैयार हो गया। समझौता यही हुआ कि रास्ते में खाने -पीने का सामान बांटकर खाएंगे। धीरे -धीरे खाने का सामान कम होने लगा और थोड़े से आटे के अलावे कुछ भी नहीं बचा। हमारे पास बहुत काम आता बचा है और यह देहाती साथी बहुत खाता है तय यही हुआ कि आटे की रोटी बना लेते हैं और सो जाते हैं जो भी उस समय की अद्भुत चीज का स्वप्न देखेगा वह ही रोटी खा लेगा। उन लोगों ने उस भोले -भाले दिहाती को धोका देने के लिए ऐसा सोचा था दोनों शहरियों ने एक मोती रोटी बनाई फिर सो गए। देहाती धोके को भांप गया और आधी रात को उठा और आधी पाकी रोटी खाकर सो गया। एक शहरी जगा और दूसरे को जगा कर कहा – मुझे एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया ऐसा लगा कि दो फरिश्तों ने स्वर्ग के द्धार खोलकर मुझे परमात्मा के समक्ष खड़ा कर दिया। अदभूत परन्तु मैंने देखा कि दो फरिश्तों ने पृथ्वी को तोड़ते हुए मुझे नरक में ले गए -दूसरे ने कहा। देहाती सोने का नाटक करता रहा। तुम कौन हो ?देहाती ने पूछा। हम तुम्हारे साथी हैं उन्होंने कहा। क्या तुम दोनों लौट आये हो ?देहाती ने पूछा। तुम कहाँ से हमारे लौटने की बात कर रहे हो ? मैंने देखा कि दो फ़रिश्ते तुम में से एक को स्वर्ग और दूसरे को नर्क ले गए। मैंने सोचा कि तुम दोनों अब नहीं लौटोगे ,मैंने रोटी खा ली। जो दूसरे को दबाने की सोचता है वह कभी -कभी स्वयं ही दब जाता है। —कुछ अकाट्य बातें -अगर जीवन में जंग अपनों से ही हो ,तो हार जाना चाहिए क्योंकि जिंदगी में कुछ रिश्ते बहुत अनमोल होते हैं //
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एक कटु सत्य –रात अँधेरी थी ,एक काफिला रेगिस्तानी सराय में ठहरा। उस काफिले में सौ ऊंट थे। उन्होंने खूंटिया गाड़कर ऊंट बांधे। किन्तु एक ऊंट अनबँधा रह गया। शायद एक खूंटी और रस्सी कहीं खो गई थी। अब आधी खूंटी और रस्सी कहाँ से लाइ जाये ? सारे के वृद्ध मालिक ने कहा -मेरे पास ना तो खूंटी है और ना ही रस्सी पर एक युक्ति अवश्य है। जाओ खूंटी गाड़ने का नाटक करो। सरदार ने कहा -अरे यह कैसा पागलपन है। ? वृद्ध ने कहा -बड़े नासमझ हो भाई ,ऐसी खूंटियां भी हों जो ना होते हुए भी गाडी जा सकती है और ऐसी ही रस्सियां भी बाँधी जा सकती हैं। अँधेरी रात है ,आदमी धोखा खा सकता है फिर तो यह एक ऊंट है। विवशतावश गड्ढा खोदने का नाटक किया सिर्फ आवाज थक -थक ऊंट बैठ गया ऊंट के गले में हाथ डाला रस्सी बंधी। जो थी ही नहीं। ऊंट सो गया। सुबह सभी हैरान थे। ९९ ऊंटों की रस्सियां निकाली वे उठ खड़े हुए किन्तु सौवां ऊंट बैठा रहा। उसे धक्के मारे फिर भी वह नहीं उठा बृद्ध से कारण पूछा गया। जाओ पहले खूंटी निकालो रस्सी खोलो जैसे बांधने का नाटक किया था वैसे ही खोलने का नाटक करो। ऐसा ही किया गया। ऊंट खड़ा हो गया बृद्ध ने कहा -यह सूत्र आज के सन्दर्भ में निहितार्थ है। बरसों तक गुलामी की रस्सी में बंधा प्राणी स्वतंत्र होने का एहसास भला कैसे करे ? जो उठाना चाह रहा है उसे ही शत्रु मान बैठा है। किसी कवि ने क्या खूब कहा है -हम बंधे हैं ,तुम बंधे हो ,/सभी एक खूंटियों से जडें हैं।

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