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अमृत की खेती-Two inspirational hindi short stories of mahatma bhudh and king akheth

Two inspirational hindi short stories of mahatma bhudh and king akheth

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एक बार भगवान् बुद्ध भीख मांगने एक किसान के दरवाजे पर पहुंचे। किसान ने अनिच्छा भाव लिए कहा -मैं तो हल जोतता हूँ ,बीज बोता हूँ तब जो फसल होता है ,मैं खाता हूँ। आपको भी खेती से प्राप्त फसल से खाना चाहिए। बुद्ध ने जवाब दिया -मैं भी खेती ही तो करता हूँ ,मेरे पास श्रद्धा का बीज ,,तप रूपी बर्षा ,प्रज्ञा रूपी जुताई और हल हैं पापभीरुता का दंड है,और विचार रूपी रस्सी है। स्मृति ,चिट्टा की जागरूता रूपी हल का फाल और पैनी है। मैं अपनी खेती को फ़ालतू घास से मुक्त रखता हूँ। और आनंद की फसल काटता हूँ। यही मुझे सीधे शान्ति धाम तक ले जाता है। अतः हे मित्र ,मैं अमृत की खेती करता हूँ

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[२]शकुंतला से मुलाक़ात -एक बार एक राजा आखेट पर जंगल में निकले। कई शिकार किये। भूख,प्यास से बेहाल राजा कण्व मुनि के आश्रम पहुंचे। आश्रम में अकेले ही गए। आश्रम सूना पड़ा था। कोई है ,की आवाज लगाते हुए भीतर गए। एक अति सुन्दर बाला उनके सम्मुख उपस्थित हुई उसने अथिति का आदर पूर्वक सत्कार किया।
राजा ने कहा-मैं मुनिवर की उपासना हेतु यहां आया हूँ। अतः हे भद्रे मेरे आराध्य कहा हैं ? शकुंतला ने किंचित आह्लादित मुद्रा में बताया की वे फल-फूल ,कंद मूल लाने हेतु वन में गए हैं। राजा ने पूछा -हे शोभने ,तुम कौन हो ?किसकी पुत्री हो ?इस निर्जन वन में किसलिए और कहाँ से आई हो ,हे सुंदरी तुम अपना परिचय दो। कन्या ने विलोभनीय हंसी हँसते हुए मधुर स्वर में उत्तर दिया -मैं कण्व मुनि की पुत्री हूँ। राजा ने संशय पूर्ण स्वर में पूछा – महर्षि कण्व तो ब्रह्मचारी हैं फिर तुम उनकी पुत्री कैसे हो सकती हो ?वास्तव में मैं विश्वामित्र और मेनका की पुत्री हूँ। किन्तु ना जाने क्यों मेरे जन्म के बाद उन्होंने मेरा त्याग कर मुझे महर्षि को सौंप कर चले गए तदुपरांत मुनिवर ने ही मुझे पाला-पोसा है। वे ही अब मेरे पिता हैं। और मैं उनकी पुत्री हूँ।

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