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राजा भोज और सत्य-two new Hindi motivational and interesting stories in hindi language

राजा भोज और सत्य -राजा भोज एक रात गहरी निद्रा में सोये थे। स्वप्न में उन्हें एक तेजस्वी वृद्ध पुरुष के दर्शन हुए। राजा ने पूछा -महात्मन आप कौन हैं ?वृद्ध पुरुष बोले -‘राजन ,मैं सत्य हूँ। और आपके द्वारा किये गए कार्यों का वास्तविक रूप दिखाने आया हूँ। मेरे पीछे -पीछे आ। राजा भोज प्रजा प्रिय थे। उन्होंने अनेक सामाजिक ,धार्मिक कार्य किये थे। दान ,पुण्य ,कथा -कीर्तन करते थे। राजा के मन में अहंकार का भाव का उदय हो गया था। सत्य राजा को उन स्थलों पर ले गए जहां उनकी कृतियाँ दृश्टिगोचर हो रही थी। जैसे ही सत्य ने पेड़ों का स्पर्श किया ,सब एक -एक कर सुख गए। ,बागीचे बंज़र भूमि में परिवर्तित हो सत्य ने मंदिर को छुआ ,वह खंडहर में बदल गया। राजा द्वारा बनवाये गए यज्ञ स्थल ,पूजन स्थल ,आदि स्थानों को ज्यों ही छुआ ,सब राख हो गए। राजा यह सब देखकर विक्षिप्त से हो गए. सत्य ने समझाया -राजन ,यश की अभिलाषा लिए जो भी कार्य किये जाते हैं उससे केवल अहंकार की पुष्टि होती है . निःस्वार्थ भाव से जो भी कार्य किये जाते हैं उन्ही का फल पुण्य रूप में मिलता है। पुण्य फल का तो यही रहस्य है। सत्य अंतर्ध्यान हो चुके थे। राजा की नींद टूट चुकी थी। उन्होंने अपने आप में विचारों का मंथन किया। और सच्ची भावना से कर्म करना प्रारम्भ किया। उन्हें यश -कीर्ति मिला तथा पुण्य भी कमाया।
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[२]क्रोध -बुद्ध ने कहा है कि क्रोध को पालकर रखना गर्म कोयले को रखने के समान है। इससे आप ही जलते हैं एक दिन महात्मा बुद्ध को शांत चित्त बैठे देखकर शिष्यों ने सोचा -कहीं वे अस्वस्थ तो नहीं हैं ?बुद्ध मौन थे। एक व्यक्ति चिल्लाया -,”आज मुझे सभा में बैठने की अनुमति क्यों नहीं दी गयी ?बुद्ध ने आँखें खोली ,कहा -वह अछूत है ,उसे आज्ञा नहीं दी जा सकती। शिष्यों को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। एक शिष्य ने कहा -‘हमारे धर्म में तो जाँत -पाँत का कोई विभेद नहीं फिर कोई अछूत कैसे हो सकता है ?बुद्ध बोले ,-आज वह क्रोधित होकर आया है। क्रोध से जीवन में एकाग्रता भंग होती है।क्रोधी व्यक्ति अक्सर मानसिक हिंसा कर बैठता है। इसलिए मनुष्य जबतक क्रोध में रहता है ,तब तक वह अछूत ही रहता है। इसलिए उसे कुछ देर एकांतवास करना चाहिए। वह व्यक्ति यह सुनकर बुद्ध की चरणों में गिर पड़ा और कभी क्रोध नहीं करने की शपथ ली। कहते है कि क्रोध करने से तन ,मन ,धन तीनो की हानि होती है। जब भी क्रोध का उड़ाई हो तो आदमी को कुछ पल एकांत में चुप -चाप रहना चाहिए। क्रोध स्वतः शांत हो जाता है।

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