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धन्य है श्रीवृंदावन-two new motivational story of Lord krishna

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1.
(धन्य है श्रीवृंदावन)

एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी वृन्दा वन के कालीदह के निकट स्थान में रुके थे। उस समय वृन्दावन के संत नाभा जी जिन्होंने भक्तमाल ग्रन्थ लिखा है, ने उस समय वृन्दावन में भक्तों का भंडारा किया। तुलसीदास उस समय वृन्दावन में ही ठहरे थे। भगवन शंकर ने गोस्वामी जी से कहा कि आप भी जाये नाभा जी के भंडारे में। तुलसीदास जी ने भगवन शंकर की आज्ञा का पालन किया और नाभा जी के भंडारे में जाने के लिए चल दिए।
जब गोस्वामी जी वहाँ पहुंचे तो वहां संतो की बहुत भीड़ थी। उनको कहीं बैठने की जगह नहीं मिली तो जहाँ संतो के जूते-चप्पल पड़े थे वो वहां ही बैठ गए। अब संत लोग भंडारा पा रहे थे, पहले ज़माने में संत लोग स्वयं अपने बर्तन लेकर जाया करते थे। आज भी वृन्दावन के रसिक संत भंडारे में अपने-अपने पात्र लेकर जाते है। अब भंडारा भी था तो खीर का था। अब जो प्रसाद बँट रहा था , वो गोस्वामी जी के पास आये और कहा बाबा -तेरो पात्र कहाँ है तेरो बर्तन कहाँ है। अब तुलसीदास जी के पास कोई बर्तन तो था नहीं तो उसने कहा कि बाबा जाओ कोई बर्तन लेकर आओ, मैं किसमें तोहे खीर दूँ। इतना कह कर वह चला गया।
थोड़ी देर बाद फिर आया तो देखा बाबा जी वैसे ही बैठे है। फिर उसने कहा बाबा मैंने तुमसे कहा था कि बर्तन ले आओ। मै तोहे किसमें खीर दूं , इतना कहने के बाद तुलसीदास जी मुस्कराने लगे और वहीं पास में एक संत का जूता पड़ा था , वो जूता परोसने वाले के सामने कर दिया और कहा इसमें खीर डाल दो तो वो परोसने वाले ने कहा कि बाबा पागल होए गयो है का इसमें खीर लोगे। तो गोस्वामी जी के आँखों में अश्रु भर आये और कहा कि ये जूता संत का है और वो भी वृन्दावन के रसिक संत का , और इस जूते में ब्रजरज पड़ी हुई है और ब्रजरज जब खीर के साथ अंदर जाएगी तो मेरा अन्ताकरन पवित्र हो जायेगा।
धन्य है वृन्दावन , धन्य है वह रज जहाँ पर हमारे प्यारे और प्यारी जू के चरण पड़े है, ये भूमि श्री राधारानी की भूमि है।
यदि हम वृन्दावन में प्रवेश करते है तो समझ लेना कि ये श्रीराधारानी की कृपा है , जो हमें वृन्दावन आने का न्यौता मिला।

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2.
(मुसलमान बना कृष्ण भक्त तो मिली सजा, फिर हुआ चमत्कार)

कृष्ण भक्त हरिदास थे तो मुसलमान, मगर हरि के परम भक्त थे। हिंदू देवता के प्रति उनकी भक्ति देख गौराई काजी को ईर्ष्या हुई और उन्होंने हरिदास के खिलाफ मुलकपति के कान भरे और कहा, ‘इस काफिर को ऐसी सजा दीजिए कि ऐसी नापाक हरकतें करने की वह फिर कभी जुर्रत न करे।’ मुलकपति ने उसकी बात मानते हुए सेवकों को आदेश दिया, ‘जाओ हरिदास को पकड़ लाओ और बेंत मारो।’
हरिदास को पकड़कर मुलकपति के पास लाया गया और सेवकों ने उन्हें बेंत से मारना चालू किया, किंतु तब भी वह हरिनाम का जप कर रहे थे। यह देख मुलकपति बोला, ‘हरिनाम बंद करोगे तो तुम्हें माफ कर दिया जाएगा।’ हरिदास ने कहा, ‘भैया! यदि तुम खुद मारना चाहते हो, तो मारते रहो, लेकिन अच्छा होता, तुम भी मेरे साथ हरि का नाम लेते।’ इससे मुलकपति को गुस्सा आया और उसने फिर से मारने का आदेश दिया। हरिदास पर बेंतों की मार का कोई असर नहीं हुआ। अब तो वह जोर-जोर से हरिनाम लेने लगे और उसी में लीन हो गए।
आखिर उन्हें मरा हुआ जान मुलकपति ने मारना बंद करने का आदेश दिया और उन्हें गंगा नदी में फेंक दिया गया। किंतु हरिदास जीवित थे। लोगों ने उन्हें बाहर निकाला और उनके घर पहुंचा दिया। बात मुलकपति तक पहुंची कि हरिदास तो जीवित हैं, तब उसे पश्चाताप हुआ और उसने हरिदास के चरण पकड़े। तब वह बोले, ‘अपराध आपका नहीं है।
यह तो होने ही वाला था। मनुष्य अपने-अपने कर्मों का फल भोगता है, अन्य लोग तो निमित्त मात्र होते हैं। वास्तव में भगवान यह जानना चाहते थे कि मैं ढोंगी तो नहीं हूं? क्या मुझे भगवान के नाम-जप में सचमुच ही रुचि है?’ यह सुनते ही उपस्थित लोगों के मुंह से ‘धन्य-धन्य शब्द निकल पड़े। मुलकपति और गौराई पर भी इसका असर पड़ा और वे उनके शिष्य बन गए।

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