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प्रतिशोध-Two new short hindi inspirational stories of two different kings

1. प्रतिशोध
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एक राजा था ,उसके यहां एक सेवक काम करता था। राजा अपने सभी सेवक का बहुत ख्याल रखता था। एक दिन की बात है एक सेवक ने राजा के भोजन में बहुत ज्यादा नमक दे दिया जिससे राजा को बहुत गुस्सा आया। क्योंकि उस दिन राजा के यहां खुछ ख़ास मेहमान आये थे। राजा ने उसे काम से निकाल दिया। वह सेवक राजा द्वारा निकाले जाने पर बहुत गुस्से में था और बदला लेने के बारे में सोचता रहता। कुछ दिनों के बाद राजा की कन्या का जन्म दिन था जिसमे उन्होंने अपनी प्रजा को भोज पर बुलाया था। एक साधू भी उस भोज में शरीक हुए। आयोजन बहुत वृहद् था ,और वह सेवक भी उस भोज में पहुंचा था। वह खाना खराब करने के बारे में सोचने लगा। साधुजी को यह ज्ञात हो गया और उन्होंने राजा से कहा ,-‘कोई आपके भोजन को खराब करना चाहता है। हम यहाँ से देख रहे हैं वह लगातार कोशिश में लगा है। राजा ने सैनिक को लगाया और जल्दी ही वह सेवक पकड़ा गया। राजा ने कहा। उस दिन मैंने तुम्हे किये की कोई सज़ा नहीं दी थी सिर्फ काम पर से निकाला था लेकिन तुम्हे समझ ही नहीं है क्योंकि तुम्हारे अंदर बदले की भावना जाग़ृत है राजा की बात सुनकर सेवक का सच्चा मन जाग उठा और उसने फिर कोई गलती नहीं की।
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[२] भ्रम
बात बहुत पुरानी है। राजा हरिश्चंद्र का राज़ था। सत्यवादी राजा के सभी पुत्र और पुत्रियाँ भी उनके ही नक्से -कदम पर चले। राजा उन्हें देखकर बहुत प्रसन्न रहते थे। एक सरोवर के निकट एक दिन राजा और रानी विश्राम के लिए बैठ गए ,पुत्र -पुत्रियां घूमने -टहलने लगे। तभी राजकुमारी को मिटटी के टीले में से दो चमकदार मणियाँ दिखाई दी। उसने एक सुखी लकड़ी से दोनों चमकदार मणियों को निकाले का प्रयत्न किया। मणि तो नहीं निकली पर वहाँ से खून निकलने लगा। खून निकलते देख दोनों भाई -बहन घबरा गए। सभी अपने पिता के पास आये और पूरी बात सुनाई। राजा उस स्थल पर पहुंचे और माज़रा देखकर बोले -‘बेटी ,तुमने बड़ा पाप कर डाला। यह तो निस्चन ऋषि हैं जिनकी तुमने आँखे फोड़ दी हैं। यह सुनते ही राजकुमारी रो पड़ी। और कहा कि मैं सर्वथा अनभिज्ञ थी कि यह महर्षि बैठे हैं हमने तो अनर्थ कर डाला। हाँ पुत्री ,-महर्षि निस्चन यहां पर घोर तपस्या में लीन थे। आंधी -तूफ़ान ,बर्षा के कारण इनके चारोंतरफ मिटटी का टीला बन गया है। इसी कारणवश तुम्हे दृस्टि -दोष हो गया। तुम्हे मात्र दो चमकती आँखे ही दिखाई दी। इतने में ऋषि के कराहने की आवाज़ सुनाई दी राजकुमारी ने अपने पापों की प्रायश्चित करने की सोची इनकी आँखे तो वापिस नहीं कर सकती पर मैं इनकी आँखे बनूँगी। क्योंकि मैं मात्र भूल या माफ़ी का बहाना बनाकर अपराध मुक्त नहीं होना चाहती। मैं इनसे विवाह करुँगी। और जीवन पर्यन्त इनकी आँख बनकर सेवा करुँगी। यहां पात्रता या योग्यता का प्रश्न नहीं है ,मुझे तो सहर्ष प्रायश्चित करना है। यही मेरा धर्म है। आप मुझे बस आशीर्वाद दीजिए। बेटी के जिद के आगे राजा को सहमति देनी पड़ी। राजकुमारी के इस अदभुत त्याग भावना को देखकर देवगण भी अति प्रसन्न हुएऔर राजकुमारी का नाम स्वेता रख दिया ,इसी कारण से वो आज भी इस दुनिया में अपने नारी गुणों के कारण पूजनीय हैं।

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