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काल पर विजय-Win over death a new inspirational story from the end of mahabharata

काल पर विजय -एक प्रेरक कहानी
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महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। युधिष्ठिर राजा बन चुके थे। प्रजा हिट में पांचो भाई राजकाज चला रहे थे। कोई भी दीन -दुखिया आता तो बड़े ही धैर्य से उनकी फ़रियाद सुनी जाती। एक दिन राजभवन में युद्धिष्ठिर गहन विचार -विमर्श में तल्लीन थे तभी एक ब्राह्मण दरबार में पहुंचा। कुछ दुष्टों ने उस ब्राह्मण को बहुत सताया था। बातचीत में मग्न महाराज उस दुखिया ब्राह्मण की बात सुन नहीं पाए। उन्होंने ब्राह्मण को बाहर इंतज़ार करने को कहा। वह बेचारा ब्राह्मण बाहर इंतज़ार करने लगा। मंत्रणा ख़त्म होने के बाद क्योंकि महाराज काफी थके होने के कारण उस ब्राह्मण को कल सुबह आने को कहा। और वे विश्राम करने हेतु भवन की तरफ चले गए। ब्राह्मण को बड़ी निराशा हुई। वह अभी घर जाने के लिए मुड़ा ही था कि उसकी मुलाक़ात भीम से हो गई। ब्राह्मण ने अपनी परेशानी बताई। भीम बहुत दुखी हुये . उन्होंने मन ही मन कुछ सोचा और द्वारपाल को आज्ञा दी -‘सैनिको को कहो कि विजय के अवसर पर बजाये जानेवाले नगाड़ें को बजाएं। आज्ञा का पालन हुआ। महाराज ने नगाड़ें की आवाज़ सुनी। उन्हें बड़ी हैरानी हुई। वे अपने विश्राम कक्ष से बाहर आये। भीम से इस बाबत पूछा। भीम ने कहा -महाराज ,हमारी सेनाओं ने तो किसी शत्रु पर विजय प्राप्त नहीं की। तो फिर ये नगाड़ें क्यों बज रहे हैं ? क्योंकि पता चला है कि म–पेड़ों के नीचे ऐसा क्या है कि हाराज ने काल पर विजय प्राप्त कर ली है।
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भीम ने उत्तर दिया। आखिर तुम कहना क्या चाहते हो -महाराज ने पूछा। महाराज ,आप ने ही इस ब्राह्मण से कहा है कि वह आपको कल मिले। इससे साफ़ जाहिर है कि आपको पता है कि आज आपकी मृत्यु नहीं होगी। आज काल भी आपका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। यही सोचकर मैंने नगाड़े बजाने का आदेश दिया। भीम की बातें सुनकर महाराज की आँखें खुल गई। और ब्राह्मण की बातें सुनकर सहाया ता के आवश्यक प्रबंध करवा दिए। इसलिए काम को कभी नहीं कल पर टालना चाहिए इसलिए हम अपनी मंज़िल को हासिल नहीं कर पाते। और चलते -एक लड़की ने दूकान में काफी देर देखने के बाद एक गिफ्ट की तरफ इशारा करते हुए पूछा -यह हँसती हुई चुड़ैल कितनी की है ? दुकानदार ने कहा -मैडमजी ,ये आईना है। —-पेड़ों के नीचे ऐसा क्या है कि कोई बुद्ध बन जाता है तो कोई न्यूटन —एक घडी खरीदकर हाथ में क्या बाँध ली -वक़्त पीछे ही पद गया मेरे। एक सबेरा था ,जब हंस कर उठते थे हम -और आज कई बार बिना मुस्कराये ही शाम हो जाती है।

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